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धानुका एग्रीटेक ने तरबूज और खीरा फसल के लिए वैज्ञानिक समाधान सुझाए

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अप्रैल–मई के दौरान जायद फसलें जैसे तरबूज और खीरा अपने बढ़वार और फल बनने के अहम चरण में होती हैं। इस समय तक अधिकतर किसानों ने बुवाई और पौधों की स्थापना का काम पूरा कर लिया होता है। तरबूज और खीरा संवेदनशील और उच्च मूल्य वाली फसलें हैं, इसलिए सिंचाई, पोषण या कीट नियंत्रण में छोटी-सी गलती भी उत्पादन और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। किसानों की फसल को सुरक्षित रखने के लिये ये धानुका एग्रीटेक कुछ जरूरी वैज्ञानिक सुझाव देता है। बढ़ती गर्मी, हीटवेव, फफूंदी जनित रोग और कीटों का प्रकोप इस समय फसल के लिये बड़ा खतरा बनता है। अच्छी और लाभदायक पैदावार के लिये किसानों को सही तकनीकों को अपनाने और समय पर प्रबंधन करना जरूरी है। किसानों को अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी और स्वस्थ बीज का उपयोग करना चाहिए।

तरबूज और खीरा की फसल में पोषक तत्वों का असंतुलन, खासकर पोटाश (K), कैल्शियम (Ca) और बोरॉन (B) की कमी, फल के आकार में कमी, फलों का फटना और गुणवत्ता में गिरावट का कारण बनती है। पोटाश पौधों की जल संतुलन क्षमता को बढ़ाता है और हीट स्ट्रेस सहने में मदद करता है, जबकि कैल्शियम फल की मजबूती बढ़ाता है। बोरॉन फूल से फल बनने की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है। संतुलित पोषण के लिये इन तत्वों का समय पर उपयोग करना आवश्यक है।

गर्मी के मौसम में एफिड्स, व्हाइटफ्लाई और फल मक्खी जैसे कीट तेजी से बढ़ते हैं, जो पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देते हैं और फल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे फफूंदी रोग पत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उत्पादन घटता है।

फसल को इन खतरों से बचाने के लिये नियमित निगरानी और समय पर कीटनाशक एवं फफूंदनाशी का छिड़काव जरूरी है। एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों और ट्रैप्स का उपयोग भी प्रभावी नियंत्रण में मदद करता है। साथ ही, मल्चिंग और नियंत्रित सिंचाई अपनाकर मिट्टी की नमी बनाए रखना जरूरी है। ड्रिप इरिगेशन से पौधों को निरंतर नमी मिलती है और हीटवेव का असर कम होता है।

ज्यादा सिंचाई से जड़ सड़न और रोग बढ़ सकते हैं, जबकि कम नमी से फल का विकास रुक जाता है। किसानों को चाहिए कि वे संतुलित सिंचाई के जरिए मिट्टी में उचित नमी बनाए रखें और जलभराव से बचें। सही समय पर पोषण, कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी तरबूज और खीरा फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर गुणवत्ता के साथ अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

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