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डॉ. सुजीत पॉल: एक ऐसे लीडर जिन्होंने हेल्थकेयर को सबके लिए आसान बनाने की हिम्मत दिखाई

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ज़ोटा हेल्थकेयर और दवाइंडिया के ज़रिए सुलभ, किफायती और नैतिक हेल्थकेयर के नए दौर की शुरुआत

हेल्थकेयर को अक्सर साइंस और आर्ट का मेल कहा जाता है, जहां मेडिकल नॉलेज, इंसानी संवेदना और संगठनात्मक समझ का संतुलन ज़रूरी होता है। लेकिन भारत में यह संतुलन आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। एक ऐसे देश में जहां अस्पतालों में भीड़ है, क्लिनिक संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं और ज़रूरी दवाइयां कई लोगों की पहुंच से बाहर हैं, वहां हेल्थकेयर देश की असमानताओं और उम्मीदों की साफ तस्वीर दिखाता है।

हर सुधार, हर इनोवेशन और हर बदलाव के पीछे एक ऐसा लीडर होता है जो हेल्थकेयर को सुविधा नहीं, बल्कि ज़रूरत के रूप में देखता है। ऐसे ही लीडर्स में डॉ. सुजीत पॉल का नाम खास तौर पर सामने आता है, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी इस बात के लिए समर्पित कर दी कि हेल्थकेयर लोगों तक बेहतर तरीके से पहुंचे। ज़ोटा हेल्थकेयर लिमिटेड के ग्रुप CEO के रूप में, डॉ. पॉल ने भारत में हेल्थकेयर की पहुंच, किफायत और इनोवेशन को नए नजरिए से देखने की सोच दी है। उनके नेतृत्व में ज़ोटा हेल्थकेयर यह दिखाने वाला उदाहरण बन चुका है कि जब बिज़नेस की सफलता सामाजिक ज़िम्मेदारी से जुड़ती है, तब हेल्थकेयर एक विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक भरोसा बन जाता है।

एक दूरदर्शी बनने की कहानी

डॉ. सुजीत पॉल की कहानी कोलकाता की उन भीड़भाड़ और अक्सर अव्यवस्थित गलियों से शुरू होती है, जहां ज़िंदगी तेज़ रफ्तार में चलती है। एक मिडिल क्लास परिवार में जन्मे सुजीत का बचपन प्यार के साथ-साथ संघर्षों से भी भरा रहा। कई लोगों की तरह वह दुनिया की सच्चाइयों से दूर नहीं पले, बल्कि उन्होंने उन्हें बहुत करीब से देखा। बचपन से ही उन्होंने देखा कि उनके परिवार सहित कई परिवारों को बुनियादी हेल्थकेयर तक पहुंचने में कितनी मुश्किलें होती हैं। अस्पतालों में भारी भीड़ रहती थी, क्लिनिक में स्टाफ की कमी थी और दवाइयां आम लोगों के लिए अक्सर बहुत महंगी होती थीं।

एक दृश्य जो उनके मन में गहराई से बैठ गया, वह था माता-पिता को ऐसे फैसले लेते देखना जो कभी नहीं लेने चाहिए—बीमार बच्चे की दवा खरीदें या घर की रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करें। कोलकाता में बड़े होते हुए सुजीत ने भारत के हेल्थकेयर सिस्टम की कमियों को सिर्फ व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक नैतिक सवाल के रूप में देखा। इन्हीं अनुभवों से वह सवाल जन्मा जिसने उनकी पूरी ज़िंदगी की दिशा तय कर दी—जब हेल्थकेयर एक बुनियादी ज़रूरत है, तो फिर यह विशेषाधिकार क्यों बने?

डॉन बॉस्को हाई स्कूल में सुजीत की जिज्ञासा और आगे बढ़ने की चाह उन्हें सबसे अलग बनाती थी। वह हमेशा टॉप छात्रों में रहे और पढ़ाई के साथ-साथ अपने आसपास की दुनिया पर सवाल उठाते रहे। साइंस में उन्हें इंसानी शरीर की कार्यप्रणाली और दवाओं के असर ने खास तौर पर आकर्षित किया। बायोलॉजी में यह गहरी रुचि आगे चलकर हेल्थकेयर मैनेजमेंट की जटिलताओं को समझने में उनके काम आई। पढ़ाई के अलावा, स्कूल के दिनों में ही उनके लीडरशिप गुण भी सामने आने लगे। चाहे छात्र कार्यक्रमों का आयोजन हो या दोस्तों की पढ़ाई में मदद करना, वह टीमवर्क और नेतृत्व के महत्व को कम उम्र में ही समझने लगे थे।

यह लीडरशिप की समझ आगे चलकर कलकत्ता यूनिवर्सिटी में उनकी उच्च शिक्षा के दौरान और मजबूत हुई। यहीं पर सुजीत ने हेल्थकेयर को सिर्फ मेडिकल फील्ड नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम के रूप में देखना शुरू किया जिस पर अर्थव्यवस्था, नीतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर का गहरा असर होता है। फार्माकोलॉजी पढ़ते हुए उन्होंने ऐसे केस स्टडी भी देखे, जिनसे यह साफ हुआ कि भारत में सप्लाई की समस्याओं के कारण ज़रूरी दवाइयां अक्सर ग्रामीण इलाकों तक पहुंच ही नहीं पातीं। तब उन्हें समझ आया कि सिर्फ दवाइयां बनाना काफी नहीं है, उन्हें सही तरीके से, सही कीमत पर और भरोसे के साथ लोगों तक पहुंचाना भी उतना ही ज़रूरी है।

कलकत्ता यूनिवर्सिटी में रहते हुए उन्हें भारत की बड़ी हेल्थकेयर चुनौतियों—जैसे मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और इलाज तक पहुंच में गहरी असमानता—को भी करीब से देखने का मौका मिला। ये सच्चाइयां उन्हें निराश करने के बजाय और मजबूत बनाती गईं। ग्रेजुएशन पूरा करते-करते सुजीत समझ चुके थे कि सिर्फ मेडिकल नॉलेज से भारत की हेल्थकेयर समस्या हल नहीं होगी। डॉ. पॉल कहते हैं, “मुझे साफ दिखने लगा था कि भारत को ऐसे लीडर्स की ज़रूरत है जो साइंस और मैनेजमेंट के बीच की दूरी को पाट सकें, जो सिर्फ लैब में ही नहीं, बल्कि बोर्डरूम में भी नए रास्ते बना सकें।”

इसी सोच के साथ सुजीत ने आईएमटी गाजियाबाद से हेल्थकेयर एडमिनिस्ट्रेशन और बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की। यहां उन्होंने यह सीखा कि मेडिकल समझ को बिज़नेस स्ट्रैटेजी के साथ कैसे जोड़ा जाए। सप्लाई चेन मैनेजमेंट से लेकर लीडरशिप थ्योरी तक, हर विषय को वह एक ही सवाल के साथ देखते थे—इसे हेल्थकेयर में कैसे लागू किया जा सकता है?

आईएमटी में ही सुजीत ने उस सोच को और साफ किया जो आगे चलकर उनके पूरे करियर की नींव बनी। उन्होंने समझा कि असली हेल्थकेयर इनोवेशन सिर्फ टेक्निकल एक्सपर्टीज़ से नहीं आता, बल्कि इसके लिए एंटरप्रेन्योर माइंडसेट, मौजूदा सिस्टम को चुनौती देने की हिम्मत और ऐसे समाधान बनाने की चाह चाहिए जो व्यवहारिक भी हों और बदलाव लाने वाले भी। पढ़ाई पूरी करते-करते सुजीत अपने करियर का एक साफ खाका बना चुके थे—एक ऐसी हेल्थकेयर व्यवस्था का सपना, जो किफायती हो, सबके लिए सुलभ हो और इनोवेशन से आगे बढ़े।

हेल्थकेयर के तीन मजबूत स्तंभ

डॉ. सुजीत पॉल का हेल्थकेयर को लेकर नजरिया तीन बुनियादी स्तंभों पर टिका है—किफ़ायती इलाज, आसान पहुंच और इनोवेशन।

“दवाइयां हर किसी के लिए किफ़ायती होनी चाहिए, हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर शहरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, और इनोवेशन हमेशा टिकाऊ और बड़े स्तर पर लागू होने वाला होना चाहिए।”

कोलकाता की संकरी गलियों में लिया गया एक संकल्प धीरे-धीरे एक साफ मिशन में बदला—साइंस को स्ट्रैटेजी से जोड़ना, संवेदना को एक्शन से और दवा को मैनेजमेंट से। आज ज़ोटा हेल्थकेयर लिमिटेड के ग्रुप CEO और दवाइंडिया जेनरिक फार्मेसी के पीछे की सोच के रूप में, डॉ. पॉल पूरे भारत में हेल्थकेयर डिलीवरी को बदलने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।

सीखने से नेतृत्व तक

जहां कई लोग मुनाफ़े या पहचान के लिए हेल्थकेयर में आते हैं, वहीं डॉ. सुजीत पॉल एक साफ मकसद के साथ इस क्षेत्र में आए। जहां दूसरों को दवा सिर्फ साइंस दिखी, वहीं उन्होंने इसे एक ऐसे सिस्टम के रूप में देखा जिसे पूरी तरह से सुधारने की जरूरत थी। मेडिकल समझ और मैनेजमेंट की जानकारी के साथ उन्होंने प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखा, एक साफ विज़न के साथ—भारत की हेल्थकेयर डिलीवरी को बदलना।

करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने अलग-अलग सेक्टर में सीनियर जिम्मेदारियां संभालीं, जहां ऑपरेशनल एक्सीलेंस और कस्टमर-फोकस्ड इनोवेशन को जोड़ने का मौका मिला। रिलायंस फार्मा रिटेल में उन्होंने बड़े स्तर पर रिटेल विस्तार की स्ट्रैटेजी बनाने और उसे लागू करने में अहम भूमिका निभाई, जिससे हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स आम लोगों तक ज्यादा आसानी से पहुंच सके। अपोलो फार्मेसी में उनका काम भी उतना ही असरदार रहा, जहां उन्होंने ऑपरेशंस को स्केल करने, सेवाओं को स्टैंडर्ड बनाने और सभी आउटलेट्स पर एक जैसी क्वालिटी सुनिश्चित करने पर फोकस किया। इन अनुभवों ने उन्हें रिटेल मैनेजमेंट की बारीकियां सिखाईं, जबकि हर फैसले के केंद्र में मरीज को रखा गया।

ज़ोटा से पहले डॉ. पॉल का नेतृत्व सिर्फ फार्मास्यूटिकल्स तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कंज़्यूमर गुड्स और हेल्थकेयर डिलीवरी तक फैला रहा। एशियन पेंट्स, बाटा, कोडक, कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल्स और ट्रस्ट फार्मेसी में उनकी भूमिकाओं ने उन्हें अलग-अलग बिज़नेस मॉडल और कस्टमर एंगेजमेंट स्ट्रैटेजी को समझने का मौका दिया। हर संगठन में उन्होंने सप्लाई चेन को बेहतर बनाने, ऑपरेशंस को ज्यादा असरदार करने और नए सर्विस मॉडल लाने के ज़रिए साफ असर छोड़ा। जब डॉ. पॉल ने ज़ोटा की जिम्मेदारी संभाली, तो वह अपने साथ एक ऐसा विज़न लेकर आए जो पारंपरिक कॉरपोरेट लक्ष्यों से कहीं आगे था।

नेतृत्व का मानवीय पक्ष

डॉ. सुजीत पॉल के नेतृत्व को दुनिया भर के हेल्थकेयर सर्किल्स में पहचान मिली है। उन्हें एशिया वन द्वारा “100 टॉप ग्लोबल लीडर्स” में शामिल किया गया, CEO इनसाइट्स ने उन्हें “हेल्थकेयर के टॉप 10 CEOs” में जगह दी, और टाइम्स नाउ ने उन्हें भारत का इम्पैक्टफुल CEO सम्मान दिया। एलेट्स टेक्नोमीडिया ने उन्हें इनोवेटिव विज़नरी और लीडिंग हेल्थकेयर CEO कहा, जबकि BARC एशिया ने उन्हें फार्मा रिटेल में इंडस्ट्री नंबर 1 CEO के रूप में रैंक किया। मनी कंट्रोल ने उन्हें भारत के टॉप 15 उभरते लीडर्स में शामिल किया।

अवार्ड्स से आगे, डॉ. पॉल की आवाज़ थॉट लीडरशिप और पब्लिक एंगेजमेंट के ज़रिए भी लोगों तक पहुंची है। उन्होंने इकोनॉमिक टाइम्स हेल्थकेयर लीडर्स समिट, रिटेल टेक्नोलॉजी कॉन्क्लेव और एलेट्स इंडिया CX समिट जैसे बड़े मंचों पर कीनोट दिए हैं। TEDx टॉक्स के ज़रिए उन्होंने एम्पैथी, इनोवेशन और जिम्मेदार नेतृत्व पर लोगों को प्रेरित किया है। एयर इंडिया, विस्तारा, स्पाइसजेट, जेट एयरवेज़ और किंगफिशर की इन-फ्लाइट मैगज़ीन में उनकी मौजूदगी ने उनके संदेश को ग्लोबल ऑडियंस तक और मजबूत किया।

डॉ. पॉल के नेतृत्व की एक खास पहचान उनका मेंटरशिप के प्रति कमिटमेंट है। ज़ोटा में उन्होंने युवाओं को दिशा देने के लिए स्ट्रक्चर्ड प्रोग्राम्स शुरू किए हैं। यह मानते हुए कि अच्छे आइडियाज़ कहीं से भी आ सकते हैं, उन्होंने ज़ोटा इनक्यूबेटर लॉन्च किया, एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहां कर्मचारी और बाहरी इनोवेटर्स अपने आइडियाज़ पेश कर सकते हैं। इनमें से कई आइडियाज़ आगे चलकर सफल प्रोडक्ट्स और सर्विसेज़ बने, जिससे ज़ोटा की परफॉर्मेंस और उसका सोशल मिशन दोनों मजबूत हुए।

डॉ. पॉल के लिए लीडरशिप सिर्फ बिज़नेस खड़ा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों और सिस्टम्स को मजबूत करने का नाम है। एफिशिएंसी को एम्पैथी से और स्ट्रैटेजी को उद्देश्य से जोड़ने की उनकी सोच ने न सिर्फ ज़ोटा की ग्रोथ को आकार दिया है, बल्कि पूरे हेल्थकेयर इकोसिस्टम पर असर डाला है। विज़न, मेंटरशिप और इनोवेशन के ज़रिए वह हेल्थकेयर में लीडरशिप की नई परिभाषा गढ़ते रहे हैं, यह साबित करते हुए कि असली असर सिर्फ हासिल की गई सफलता में नहीं, बल्कि बदली हुई ज़िंदगियों और बनाई गई विरासत में होता है।

कर्मचारी अक्सर उन्हें एक पारंपरिक CEO नहीं, बल्कि एक मेंटर के रूप में देखते हैं—ऐसा व्यक्ति जो सुनता है, टैलेंट को आगे बढ़ाता है और हर स्तर पर सहयोग को बढ़ावा देता है। इनोवेशन पर उनका ज़ोर यह सुनिश्चित करता है कि ज़ोटा हमेशा आगे की सोच रखे और बदलती हेल्थकेयर चुनौतियों के लिए तैयार रहे। साथ ही, ह्यूमन-सेंट्रिक लीडरशिप पर उनकी पकड़ यह तय करती है कि ग्रोथ कभी भी संवेदना या नैतिक जिम्मेदारी की कीमत पर न आए।

अपने पूरे करियर में डॉ. पॉल ने लगातार यह दिखाया है कि हेल्थकेयर में सफलता सिर्फ दवा या बिज़नेस की समझ से नहीं आती। इसके लिए एक इंटीग्रेटेड अप्रोच चाहिए—जहां ऑपरेशनल एफिशिएंसी के साथ करुणा हो, एनालिटिक्स के साथ समझ हो, और लीडरशिप के साथ सेवा की भावना हो। इसी सोच ने ज़ोटा हेल्थकेयर को इंडस्ट्री का लीडर बनाया है और भारत के हेल्थकेयर इकोसिस्टम को भी ज्यादा समग्र और पेशेंट-सेंट्रिक बनने के लिए प्रेरित किया है।

ज़ोटा हेल्थकेयर: इनोवेशन एक जीवनशैली के रूप में

डॉ. सुजीत पॉल के नेतृत्व में ज़ोटा हेल्थकेयर लिमिटेड भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर में इनोवेशन और बदलाव का एक मजबूत उदाहरण बन चुका है। डॉ. पॉल कहते हैं, “मेरा फोकस हमेशा एक्सेसिबिलिटी, अफोर्डेबिलिटी और बिना किसी समझौते के क्वालिटी पर रहा है। मुनाफा तो सिर्फ उस उद्देश्य का नतीजा है जिसे सही तरीके से पूरा किया जाए।” उन्होंने सिर्फ एक फार्मा कंपनी नहीं बनाई, बल्कि एक ऐसा मूवमेंट खड़ा किया है जिसने यह बदल दिया है कि भारत में हेल्थकेयर लोगों तक कैसे पहुंचता है।

डॉ. पॉल के नेतृत्व में ज़ोटा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा एक नया ड्रग डिलीवरी सिस्टम, जिसने दवाओं की असरकारिता बढ़ाई और साइड इफेक्ट्स कम किए। यह ब्रेकथ्रू कंपनी की साइंटिफिक इनोवेशन और पेशेंट सेफ्टी के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दिखाता है। इससे यह साफ हुआ कि ज़ोटा सिर्फ छोटे सुधारों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि साइंस में लीड करना चाहती है।

यह समझते हुए कि भारत की हेल्थकेयर चुनौतियां सिर्फ साइंटिफिक नहीं बल्कि सिस्टम से जुड़ी हुई भी हैं, डॉ. पॉल ने एक व्यापक एक्सपैंशन स्ट्रैटेजी पर काम किया। ज़ोटा के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को नए सिरे से डिजाइन किया गया ताकि दूर-दराज़ के इलाकों और कम सुविधाओं वाले समुदायों तक पहुंच आसान हो सके। इससे देश की सबसे भरोसेमंद हेल्थकेयर सप्लाई चेन में से एक तैयार हुई।

एक्सपैंशन के साथ-साथ उन्होंने एक मजबूत डायवर्सिफिकेशन प्लान भी शुरू किया। इसके तहत ज़ोटा ने न्यूट्रास्यूटिकल्स, मेडिकल डिवाइसेज़, ओवर-द-काउंटर प्रोडक्ट्स और डिजिटल हेल्थ सॉल्यूशंस में कदम रखा। यह सोच सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रिवेंशन और वेलनेस तक फैली हुई थी।

इस पूरे बदलाव की रीढ़ टेक्नोलॉजी बनी। डॉ. पॉल के नेतृत्व में ज़ोटा ने अपनी सप्लाई चेन में AI और मशीन लर्निंग को जोड़ा। प्रिडिक्टिव सिस्टम्स के ज़रिए डिमांड का अनुमान लगाया गया, इन्वेंटरी को बेहतर तरीके से मैनेज किया गया और वेस्ट को कम किया गया। इससे कंपनी अपने अफोर्डेबिलिटी मिशन पर कायम रहते हुए ऑपरेशनल एक्सीलेंस बनाए रख सकी। हर स्तर पर इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ज़ोटा हेल्थकेयर रिसर्च ग्रांट जैसी पहल भी शुरू की, जिससे रियल-वर्ल्ड हेल्थ चैलेंजेज़ पर काम कर रहे युवा रिसर्चर्स को सपोर्ट मिला। नए टैलेंट में निवेश करके ज़ोटा ने ऐसा इकोसिस्टम बनाया है जहां नए आइडियाज़ आगे चलकर प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस बन सकें। साइंटिफिक प्रोग्रेस, सस्टेनेबिलिटी और लोगों को केंद्र में रखने वाले अप्रोच के ज़रिए ज़ोटा आज भारतीय हेल्थकेयर में एक ट्रांसफॉर्मेटिव ताकत बन चुकी है, जो यह दिखाती है कि उद्देश्य और इनोवेशन साथ चलें तो लीडरशिप का मतलब क्या होता है।

दवाइंडिया जेनेरिक फार्मेसी: हेल्थकेयर में एक नई क्रांति

अगर ज़ोटा हेल्थकेयर लिमिटेड को इस संगठन का दिमाग कहा जाए, तो दवाइंडिया जेनेरिक फार्मेसी उसका धड़कता हुआ दिल है। डॉ. सुजीत पॉल के नेतृत्व में 2017 में शुरू हुई दवाइंडिया एक बेहद सरल लेकिन मजबूत सोच पर बनी थी—अच्छी क्वालिटी की दवाएं असरदार होने के लिए महंगी होना ज़रूरी नहीं हैं।

कई सालों तक जेनेरिक दवाओं को ब्रांडेड दवाओं से कम असरदार माना जाता रहा। दवाइंडिया ने इस सोच को बदला और यह साबित किया कि सख्त क्वालिटी कंट्रोल और किफायती कीमतें साथ-साथ चल सकती हैं। कच्चे माल की सोर्सिंग से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग और डिस्ट्रीब्यूशन तक हर स्टेज पर कड़े चेक्स लगाए गए और नतीजे बेहद शानदार रहे। कुछ ही सालों में दवाइंडिया भारत की सबसे बड़ी फार्मेसी चेन में से एक बन गई, जिसके देशभर में 1,500 से ज्यादा आउटलेट्स हैं। इसका कंपनी-ओन्ड, कंपनी-ऑपरेटेड (COCO) मॉडल हर जगह एक जैसी कीमत, एक जैसा सर्विस लेवल और भरोसेमंद प्रोडक्ट क्वालिटी सुनिश्चित करता है। चाहे मेट्रो सिटी हो या बिहार का कोई स्मॉल टाउन, ग्राहकों को हर जगह एक जैसा प्रोफेशनल एक्सपीरियंस और साफ-सुथरी कीमतें मिलती हैं।

दवाइंडिया का पोर्टफोलियो सिर्फ जेनेरिक दवाओं तक सीमित नहीं है। इसमें OTC प्रोडक्ट्स, आयुर्वेदिक फॉर्म्युलेशंस, न्यूट्रास्यूटिकल्स, फिटनेस सप्लीमेंट्स, सर्जिकल एसेंशियल्स, कॉस्मेटिक्स और खादी इंडिया प्रोडक्ट्स भी शामिल हैं। इस वजह से दवाइंडिया हेल्थ और वेलनेस के लिए एक वन-स्टॉप डेस्टिनेशन बन गया है।

एक्सेसिबिलिटी को और बेहतर बनाने के लिए दवाइंडिया ने अपना ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी लॉन्च किया, जिससे फिजिकल और डिजिटल दोनों चैनल एक साथ जुड़ गए। यह ओम्नी-चैनल मॉडल पैंडेमिक के दौरान बेहद काम का साबित हुआ और इससे ग्रामीण और सेमी-अर्बन इलाकों तक हेल्थकेयर की पहुंच बनी रही।

कंपनी की इस प्रतिबद्धता और इनोवेशन को कई बड़े सम्मान भी मिले हैं, जिनमें फार्मेसी रिटेलर ऑफ द ईयर (आईआरईसी), रिटेल फार्मेसी में प्रेस्टिजियस ब्रांड (बार्क एशिया) और बेस्ट ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इनोवेशन (ईटी नाउ) जैसे अवॉर्ड शामिल हैं। लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद भारत में जेनेरिक दवाओं को लेकर बनी सोच को बदलना है—उन्हें सिर्फ सस्ती विकल्प से हटाकर भरोसेमंद और असरदार हेल्थकेयर सॉल्यूशन के रूप में स्थापित करना। ज़ोटा हेल्थकेयर लिमिटेड की रिटेल आर्म के रूप में दवाइंडिया वही सोच आगे बढ़ाती है, जहां इनोवेशन, एक्सीलेंस और सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के साथ क्वालिटी दवाएं लाखों लोगों तक पहुंचाई जा रही हैं।

सामाजिक जिम्मेदारी की एक मजबूत विरासत

डॉ. सुजीत पॉल के लिए हेल्थकेयर में लीडरशिप सिर्फ बिज़नेस की सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और समुदाय के लिए जिम्मेदारी निभाने से जुड़ी है। ज़ोटा हेल्थकेयर और दवाइंडिया जेनेरिक फार्मेसी में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) काम करने के तरीके का अहम हिस्सा है। दोनों कंपनियां नियमित रूप से फ्री हेल्थ कैंप लगाती हैं, जहां जरूरतमंद लोगों को जरूरी हेल्थकेयर सेवाएं दी जाती हैं। इन पहलों के तहत मेडिकल चेक-अप, डॉक्टर की सलाह और दवाएं उन हजारों लोगों तक पहुंचती हैं, जिन्हें आमतौर पर ऐसी सुविधाएं नहीं मिल पातीं।

इसके साथ ही, स्वच्छता, पोषण और बीमारियों से बचाव को लेकर एजुकेशनल प्रोग्राम भी चलाए जाते हैं, खासकर स्कूल के बच्चों और युवाओं के लिए। रोकथाम पर फोकस करके ये प्रयास ज्यादा स्वस्थ और जागरूक पीढ़ी तैयार करने में मदद करते हैं।

सस्टेनेबिलिटी भी एक बड़ा फोकस एरिया है। ज़ोटा ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग में ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाई है, जिससे कार्बन एमिशन कम हुआ है, जबकि दवाइंडिया प्रोजेक्ट संजीवनी, #Change और #CareForAll जैसी कम्युनिटी-केंद्रित पहल के जरिए किफायती हेल्थकेयर को बढ़ावा देती है। डॉ. पॉल कहते हैं, “ये प्रयास कोई दान नहीं हैं।”

“मेरा पूरा विश्वास है कि बिज़नेस की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे जिस समाज की सेवा करते हैं, उसमें योगदान दें।”

आगे का रास्ता: ज़ोटा और दवाइंडिया का भविष्य

आगे देखते हुए, डॉ. पॉल की ज़ोटा हेल्थकेयर और दवाइंडिया के लिए सोच इनोवेटिव भी है और पेशेंट-केंद्रित भी। एक बड़ा फोकस पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन पर है, जहां जीनोमिक्स और प्रोटीओमिक्स में निवेश करके इलाज को व्यक्ति के जेनेटिक प्रोफाइल के हिसाब से तैयार किया जाएगा। ज़ोटा फार्मास्यूटिकल्स में 3D प्रिंटिंग की संभावनाएं भी तलाश रहा है, जो दवाओं की डोज़ और डिस्ट्रीब्यूशन को पूरी तरह बदल सकती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी एक अहम क्षेत्र है, जिससे प्रेडिक्टिव हेल्थकेयर, पर्सनलाइज़्ड ट्रीटमेंट प्लान और बीमारियों की जल्दी पहचान संभव होगी। डॉ. पॉल ग्लोबल एक्सपैंशन की भी कल्पना करते हैं, जहां अगले एक दशक में 100 से ज्यादा देशों तक पहुंचने का लक्ष्य है, खासकर इमर्जिंग मार्केट्स में। सरकारों और हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के साथ पार्टनरशिप के जरिए किफायती सॉल्यूशंस को नेशनल हेल्थकेयर सिस्टम में जोड़ा जाएगा, ताकि अच्छी क्वालिटी की केयर हर जगह मिल सके।

उद्देश्य के साथ लीडरशिप

डॉ. सुजीत पॉल ने ज़ोटा हेल्थकेयर और दवाइंडिया में इनोवेशन की एक ऐसी संस्कृति बनाई है, जहां क्रिएटिविटी और उद्देश्य साथ-साथ चलते हैं। कर्मचारियों को खुलकर सोचने, पुराने तरीकों को चुनौती देने और ऐसे सॉल्यूशंस बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जो सीधे मरीजों की देखभाल को बेहतर बनाएं। इससे इनोवेशन का एक लगातार चलने वाला, उद्देश्य-आधारित चक्र बना है, जो दोनों संगठनों को हेल्थकेयर के क्षेत्र में आगे बनाए रखता है।

जैसा कि वह अक्सर कहते हैं, “हमारा विज़न हेल्थकेयर को बदलना और लाखों लोगों की ज़िंदगी की क्वालिटी बेहतर बनाना है।” उनके मार्गदर्शन में हर नई पहल और हर ब्रेकथ्रू इसी सोच को दर्शाता है। आज ज़ोटा और दवाइंडिया सिर्फ हेल्थकेयर कंपनियां नहीं हैं, बल्कि ऐसी संस्थाएं हैं जो बदलाव ला रही हैं—संवेदनशीलता से प्रेरित, इनोवेशन से आगे बढ़ती हुई, और उस उद्देश्य से जुड़ी हुई जो मुनाफे से कहीं आगे जाता है।

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